Poem on प्राकृति और मनुष्यों

प्राकृति को एक नजर तो देखो. तभी पता चलेगा उसकी,. सुंदरता और कितनी मदत करती है हम मनुष्यों को, पुलक प्रकट करती है पृथ्वी. नीली लंबी नदियों और सुंदर, उची पर्वतों से, चाँदनी रात मे, काले आकाश में, तारे चमकते टिम टिमाते हैं।

तारे बस चाँद के सामने चमकते, सुरज आए तो झटपट गायब हो जाए,. वैसे ही मनुष्यों बस मनुष्यों का हि मदत करते हैं. प्राकृति, प्यारे जानवरो का मदत नहीं करते। अब तो ऐसा युग आया है की, मनुष्य मनुष्य का ही मदत नही कर रहे हैं, अब सब पराए हो चूके है अपना कोई नहीं है।

जरा गुलाब के पौधे को तो देखो काटे फूल साथ मे रहते हैं कभी झगडा नहीं करते, जरा पक्षियों की रलक्ष्ण ध्वनी तो सुनो मन बाम बाग हो जाते हैं, इन हवा को तो महशूस करो कितना अच्छा लगता है।

फूलों की सुंदरता देखकर, आँखे हो जाती है शीतल, कही पल्लत छाया में, रुक – एक गाती वन प्रिय कोयल, प्रकृति के सही रास्ते पर चलना सीख लो क्योंकि बंद नहीं, अब भी चलते है नियति नटी के कार्य-कारण, पर कितने एकांत भाव से कितने शांत और चुपचात,

–Vishal rakesh Yadav

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